युधिष्ठिर ने पूछा- हे भगवान! आपने सफला एकादशी का माहात्म्य बताकर बड़ी कृपा की। अब कृपा करके यह बतलाइए कि पौष शुक्ल एकादशी का क्या नाम है उसकी विधि क्या है और उसमें कौन-से देवता का पूजन किया जाता है।
देवदेव जगन्नाथ पुत्रं मे देहि केशव । तव प्रसादात् गोविन्द भक्तिं मुक्तिं च शाश्वतीम् ॥
वर्ष की दो एकादशियों को पुत्रदा एकादशी के नाम से जाना जाता है। पौष और श्रवण शुक्ल पक्ष की एकादशी को पुत्रदा एकादशी कहा जाता है। पौष मास की पुत्रदा एकादशी का उत्तर भारतीय राज्यों में अधिक महत्व है जबकि अन्य राज्यों में श्रावण मास की पुत्रदा एकादशी का अधिक महत्व है।
युधिष्ठिर ने पूछा- हे भगवान! आपने सफला एकादशी का माहात्म्य बताकर बड़ी कृपा की। अब कृपा करके यह बतलाइए कि पौष शुक्ल एकादशी का क्या नाम है उसकी विधि क्या है और उसमें कौन-से देवता का पूजन किया जाता है।
भक्तवत्सल भगवान श्रीकृष्ण बोले- हे राजन! इस एकादशी का नाम पुत्रदा एकादशी है। इसमें भी नारायण भगवान की पूजा की जाती है। इस चर और अचर संसार में पुत्रदा एकादशी के व्रत के समान दूसरा कोई व्रत नहीं है। इसके पुण्य से मनुष्य तपस्वी, विद्वान और लक्ष्मीवान होता है। इसकी मैं एक कथा कहता हूँ सो तुम ध्यानपूर्वक सुनो।
भद्रावती नामक नगरी में सुकेतुमान नाम का एक राजा राज्य करता था। उसके कोई पुत्र नहीं था। उसकी स्त्री का नाम शैव्या था। वह निपुत्री होने के कारण सदैव चिंतित रहा करती थी। राजा के पितर भी रो-रोकर पिंड लिया करते थे और सोचा करते थे कि इसके बाद हमको कौन पिंड देगा। राजा को भाई, बाँधव, धन, हाथी, घोड़े, राज्य और मंत्री इन सबमें से किसी से भी संतोष नहीं होता था।
वह सदैव यही विचार करता था कि मेरे मरने के बाद मुझको कौन पिंडदान करेगा। बिना पुत्र के पितरों और देवताओं का ऋण मैं कैसे चुका सकूँगा। जिस घर में पुत्र न हो उस घर में सदैव अँधेरा ही रहता है। इसलिए पुत्र उत्पत्ति के लिए प्रयत्न करना चाहिए। जिस मनुष्य ने पुत्र का मुख देखा है, वह धन्य है। उसको इस लोक में यश और परलोक में शांति मिलती है अर्थात उनके दोनों लोक सुधर जाते हैं। पूर्व जन्म के कर्म से ही इस जन्म में पुत्र, धन आदि प्राप्त होते हैं। राजा इसी प्रकार रात-दिन चिंता में लगा रहता था।
एक समय तो राजा ने अपने शरीर को त्याग देने का निश्चय किया परंतु आत्मघात को महान पाप समझकर उसने ऐसा नहीं किया। एक दिन राजा ऐसा ही विचार करता हुआ अपने घोड़े पर चढ़कर वन को चल दिया तथा पक्षियों और वृक्षों को देखने लगा। उसने देखा कि वन में मृग, व्याघ्र, सूअर, सिंह, बंदर, सर्प आदि सब भ्रमण कर रहे हैं। हाथी अपने बच्चों और हथिनियों के बीच घूम रहा है।
इस वन में कहीं तो गीदड़ अपने कर्कश स्वर में बोल रहे हैं, कहीं उल्लू ध्वनि कर रहे हैं। वन के दृश्यों को देखकर राजा सोच-विचार में लग गया। इसी प्रकार आधा दिन बीत गया। वह सोचने लगा कि मैंने कई यज्ञ किए, ब्राह्मणों को स्वादिष्ट भोजन से तृप्त किया फिर भी मुझको दु:ख प्राप्त हुआ, क्यों?
राजा प्यास के मारे अत्यंत दु:खी हो गया और पानी की तलाश में इधर-उधर फिरने लगा। थोड़ी दूरी पर राजा ने एक सरोवर देखा। उस सरोवर में कमल खिले थे तथा सारस, हंस, मगरमच्छ आदि विहार कर रहे थे। उस सरोवर के चारों तरफ मुनियों के आश्रम बने हुए थे। उसी समय राजा के दाहिने अंग फड़कने लगे। राजा शुभ शकुन समझकर घोड़े से उतरकर मुनियों को दंडवत प्रणाम करके बैठ गया।
राजा को देखकर मुनियों ने कहा- हे राजन! हम तुमसे अत्यंत प्रसन्न हैं। तुम्हारी क्या इच्छा है, सो कहो। राजा ने पूछा- महाराज आप कौन हैं, और किसलिए यहाँ आए हैं। कृपा करके बताइए। मुनि कहने लगे कि हे राजन! आज संतान देने वाली पुत्रदा एकादशी है, हम लोग विश्वदेव हैं और इस सरोवर में स्नान करने के लिए आए हैं।
यह सुनकर राजा कहने लगा कि महाराज मेरे भी कोई संतान नहीं है, यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो एक पुत्र का वरदान दीजिए। मुनि बोले- हे राजन! आज पुत्रदा एकादशी है। आप अवश्य ही इसका व्रत करें, भगवान की कृपा से अवश्य ही आपके घर में पुत्र होगा।
मुनि के वचनों को सुनकर राजा ने उसी दिन एकादशी का व्रत किया और द्वादशी को उसका पारण किया। इसके पश्चात मुनियों को प्रणाम करके महल में वापस आ गया। कुछ समय बीतने के बाद रानी ने गर्भ धारण किया और नौ महीने के पश्चात उनके एक पुत्र हुआ। वह राजकुमार अत्यंत शूरवीर, यशस्वी और प्रजापालक हुआ।
श्रीकृष्ण बोले- हे राजन! पुत्र की प्राप्ति के लिए पुत्रदा एकादशी का व्रत करना चाहिए। जो मनुष्य इस माहात्म्य को पढ़ता या सुनता है उसे अंत में स्वर्ग की प्राप्ति होती है।
हिंदू धर्म में मृत्यु के समय कुछ महत्वपूर्ण संस्कार होते हैं, जो केवल पुत्र द्वारा ही किए जाते हैं। पुत्र के द्वारा अंतिम संस्कार से ही माता-पिता की आत्मा को मोक्ष की प्राप्ति होती है। माता-पिता की मृत्यु के बाद, पुत्र द्वारा श्राद्ध का नियमित अनुष्ठान भी किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि श्राद्ध करने से मृतक की आत्मा को संतुष्टि मिलती है।
जिन जोड़ों को जीवन में पुत्र सुख नहीं मिलता है, वे बहुत परेशान रहते हैं। पुत्र सुख की प्राप्ति के लिए पुत्र एकादशी का व्रत किया जाता है। पुत्रदा एकादशी का व्रत उन दंपत्तियों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है जिनके कोई पुत्र नहीं है।
श्रावण शुक्ल पक्ष एकादशी को वैष्णव समुदाय में पवित्रोपन एकादशी या पवित्रा एकादशी के रूप में जाना जाता है।
एकादशी के व्रत की समाप्ति को पारण कहते हैं। एकादशी व्रत के अगले दिन सूर्योदय के बाद पारण किया जाता है. द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले एकादशी व्रत को तोड़ना बहुत जरूरी है। यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पहले समाप्त हो जाती है, तो एकादशी व्रत सूर्योदय के बाद ही समाप्त होता है। द्वादशी तिथि में पारण न करना पाप करने के समान है।
हरि वसर में भी एकादशी का व्रत नहीं तोड़ना चाहिए। व्रत रखने वाले भक्तों को व्रत तोड़ने से पहले हरि वासरा के अंत की प्रतीक्षा करनी चाहिए। हरि वासरा द्वादशी तिथि की पहली तिमाही की अवधि है। व्रत तोड़ने का सबसे अच्छा समय सुबह का होता है। व्रत रखने वाले भक्तों को दोपहर के समय व्रत तोड़ने से बचना चाहिए। किसी कारणवश यदि कोई व्यक्ति प्रातः काल पारण नहीं कर पाता है तो उसे दोपहर के बाद पारण करना चाहिए।
कभी-कभी एकादशी का व्रत लगातार दो दिनों तक किया जाता है। जब एकादशी का व्रत दो दिन का हो तो पहले दिन चतुर परिवार के सदस्यों को एकादशी का व्रत करना चाहिए। दुसरे दिन वाली एकादशी को दूजी एकादशी कहते हैं। संन्यासी, विधवा और मोक्ष प्राप्त करने के इच्छुक भक्तों को दूजी एकादशी का व्रत करना चाहिए। जब भी एकादशी का व्रत दो दिन का होता है तो दूजी एकादशी और वैष्णव एकादशी एक ही दिन पड़ती है।