जानिए अपरा एकादशी की दिव्य कथा, भगवान त्रिविक्रम की महिमा और वह रहस्य, जिससे श्रीहरि भक्तों के पाप हरकर वैकुण्ठ का मार्ग खोलते हैं। जो मनुष्य इस व्रत को करते हैं, वे संसार में प्रसिद्ध हो जाते हैं।
॥शांताकारं भुजङ्ग शयनम पद्म नाभं सुरेशम॥
महाभारत काल में धर्मराज युधिष्ठिर ने विनम्र भाव से भगवान श्रीकृष्ण से पूछा—
“हे जगन्नाथ! ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी का क्या नाम है? उसका व्रत किस प्रकार मनुष्य को पापों से मुक्त करता है? कृपा करके उसका दिव्य माहात्म्य बताइए।”
तब करुणामयी मुस्कान के साथ भगवान श्रीकृष्ण बोले—
“हे राजन! यह पावन तिथि ‘अपरा एकादशी’ तथा ‘अचला एकादशी’ के नाम से प्रसिद्ध है। ब्रह्मवैवर्त पुराण और भविष्य पुराण में इसकी महिमा का विस्तार से वर्णन मिलता है। ‘अपरा’ अर्थात जिसका पुण्य अपरिमित हो, जो भक्त को सांसारिक मोह से ऊपर उठाकर श्रीहरि की शरण में ले जाए।”
भगवान विष्णु का त्रिविक्रम स्वरूप इस दिन विशेष रूप से पूजित होता है। यही वह दिव्य अवतार है जिसमें श्रीहरि ने वामन रूप धारण कर दैत्यराज बलि से तीन पग भूमि मांगी थी। पहले चरण में उन्होंने पृथ्वी को नापा, दूसरे में समस्त स्वर्गलोक को, और तीसरे चरण के लिए स्वयं बलि ने अपना सिर अर्पित कर दिया। इस लीला ने यह सिद्ध किया कि सम्पूर्ण सृष्टि श्रीहरि के चरणों में ही स्थित है।
अपरा एकादशी केवल उपवास नहीं, बल्कि आत्मा को शुद्ध करने का एक आध्यात्मिक साधन मानी गई है। शास्त्रों में कहा गया है कि इस व्रत के प्रभाव से मनुष्य के अनेक प्रकार के पाप क्षीण हो जाते हैं— जैसे झूठ बोलना, किसी निर्दोष की निंदा करना, छलपूर्वक धन कमाना, असत्य ज्ञान फैलाना, गुरु का अपमान करना अथवा धर्म से विमुख होना।
पुराणों में वर्णित है कि जो व्यक्ति जीवन में भूलों और अपराधों के बोझ से दबा हुआ हो, वह भी यदि सच्चे पश्चाताप और श्रीविष्णु भक्ति के साथ अपरा एकादशी का व्रत करे, तो उसके जीवन में नई दिव्यता का उदय होता है। क्योंकि भगवान विष्णु केवल कर्म नहीं देखते, वे भक्त का अंतःकरण भी देखते हैं।
श्रीकृष्ण आगे कहते हैं—
“हे राजन! जिस पुण्य की प्राप्ति कार्तिक पूर्णिमा में पुष्कर स्नान से, गंगा तट पर पितरों के तर्पण से, सूर्यग्रहण में कुरुक्षेत्र स्नान से, केदारनाथ और बद्रीनाथ के दर्शन से या स्वर्णदान से होती है, वही पुण्य अपरा एकादशी के श्रद्धापूर्वक पालन से प्राप्त हो सकता है।”
इसी कारण यह एकादशी पापरूपी अंधकार को मिटाने वाला सूर्य कही गई है। जैसे अग्नि ईंधन को भस्म कर देती है, वैसे ही श्रीहरि का स्मरण और यह व्रत मनुष्य के भीतर छिपे अहंकार, लोभ और अधर्म को जला देता है।
प्राचीन समय में महीध्वज नामक एक धर्मात्मा और विष्णुभक्त राजा राज्य करता था। वह न्यायप्रिय, दयालु और सदैव भगवान विष्णु के नाम में लीन रहने वाला था। किंतु उसका छोटा भाई वज्रध्वज अत्यंत क्रूर और ईर्ष्यालु था। बड़े भाई की लोकप्रियता और धर्मशीलता देखकर उसके मन में द्वेष उत्पन्न हो गया।
एक अमावस्या की अंधेरी रात में वज्रध्वज ने विश्वासघात करके महीध्वज की हत्या कर दी और उसके शरीर को एक पीपल वृक्ष के नीचे गाड़ दिया। अकाल मृत्यु और अधूरी इच्छाओं के कारण राजा की आत्मा प्रेतयोनि में भटकने लगी। वह उसी वृक्ष पर निवास कर राहगीरों को भयभीत करने लगी।
कुछ समय बाद वहां से महान तपस्वी धौम्य ऋषि गुजरे। अपने दिव्य तपोबल से उन्होंने उस प्रेतात्मा के दुख का कारण जान लिया। ऋषि ने अनुभव किया कि यह आत्मा भीतर से अभी भी श्रीहरि की शरण चाहती है।
दयालु ऋषि ने ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष की अपरा एकादशी का व्रत पूर्ण विधि से किया। उन्होंने भगवान विष्णु की पूजा कर अपने व्रत का समस्त पुण्य उस पीड़ित आत्मा को समर्पित कर दिया।
व्रत के पुण्य प्रभाव से उसी क्षण राजा महीध्वज की प्रेतयोनि समाप्त हो गई। उसका शरीर दिव्य प्रकाश से भर उठा। आकाश से पुष्पों की वर्षा होने लगी और एक दिव्य विमान वहां प्रकट हुआ। राजा ने ऋषि को प्रणाम किया और भगवान विष्णु का स्मरण करते हुए वैकुण्ठ धाम की ओर प्रस्थान किया।
यह कथा केवल एक चमत्कार नहीं, बल्कि श्रीहरि की करुणा का संदेश है। भगवान विष्णु अपने भक्त को कभी त्यागते नहीं। चाहे जीव कितना भी भटक जाए, यदि वह सच्चे हृदय से श्रीहरि की शरण ग्रहण करे, तो उनके चरण उसे अंधकार से निकालकर दिव्यता की ओर ले जाते हैं।
“जो भक्त श्रद्धा और भक्ति से अपरा एकादशी का व्रत करता है, वह अंततः श्रीविष्णु की कृपा प्राप्त कर वैकुण्ठ धाम को जाता है।”