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माँ दुर्गा सहस्त्रनामावली

Durga Maa Ke 108 Naam Stotra
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  • 5 months ago
  • Mamta Sharma
  • 08 Dec 2025

मंत्र

ॐ जयन्ती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी। दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते।।

शक्ति आराधना की सहजता का मूल कारण है – माँ की असीम करुणा, दया और स्नेह। देवी का मातृत्व ऐसा होता है कि वह अपने किसी भी भक्त या साधक को दुःखी, निर्बल या निराश नहीं देख सकती। जब साधक सच्चे भाव से माँ की स्तुति करता है, तो देवी-कृपा सहज ही उस पर अवतरित हो जाती है। उनका आशीर्वाद इतना पूर्ण होता है कि साधक में स्वयं स्थित दिव्य शक्ति प्रकट होने लगती है, और उसे किसी बाहरी सहारे की आवश्यकता नहीं रह जाती। वह स्वयं समर्थ, सामर्थ्यवान और आत्मबल से परिपूर्ण हो जाता है।

देवी-उपासना की विशेषता यह है कि उनकी प्रसन्नता हेतु किसी कठोर या जटिल मुहूर्त-संहिता की अनिवार्यता नहीं है। विशेषतः चंडी-पाठ और चंडी हवन के लिए शास्त्रों में कोई बाध्यकारी मुहूर्त निर्धारित नहीं है; यह साधना किसी भी समय, शुद्ध भाव से की जा सकती है। हालांकि, नवरात्रि का काल विशेष रूप से शक्तिपूजा का सर्वश्रेष्ठ समय माना गया है। इस अवधि में तप, जाप, हवन और साधनाओं का फल कई गुना अधिक और शीघ्र प्राप्त होता है। इसी फलदायी प्रकृति के कारण नवरात्रि को ‘कामदूधा काल’ भी कहा गया है—अर्थात् वह समय जब साधक की इच्छाएँ सहज ही पूर्ण होने लगती हैं।

देवी या देवता की कृपा प्राप्त करने के लिए ‘पंचांग साधन’ अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। पंचांग साधन पाँच अंगों का संगठित रूप है:

  1. पटल
  2. पद्धति
  3. कवच
  4. सहस्त्रनाम
  5. स्रोत (स्तोत्र)

शास्त्रों में इन पाँचों अंगों को साधना-शरीर की संरचना के रूप में वर्णित किया गया है—पटल को शरीर, पद्धति को शिर, कवच को नेत्र, सहस्त्रनाम को मुख और स्रोत को जिह्वा कहा गया है। जब साधक इन पाँचों के संतुलित अभ्यास में निपुण हो जाता है, तो उसकी साधना पूर्ण स्वरूप धारण कर लेती है।

सहस्त्रनाम विशेष रूप से देवी-उपासना का अत्यंत शक्तिशाली अंग है। इसमें देवी के हजार नाम संकलित हैं—नाम जो उनके स्वरूप, गुण, शक्तियों और कार्यों के आधार पर निर्धारित किए गए हैं। सहस्त्रनाम के दैनिक पाठ से साधक का मन, प्राण और चेतना दिव्य ऊर्जा से परिपूर्ण होने लगते हैं। अनेक परंपराओं में सहस्त्रनाम के प्रत्येक नाम से हवन करने का विधान भी बताया गया है, जिसमें नाम के पश्चात ‘नमः’ तथा अंत में ‘स्वाहा’ बोला जाता है। यह प्रक्रिया साधक के भीतर स्थित शक्तितत्त्व को जागृत कर देती है।

इन सभी अंगों की संयुक्त साधना से साधक का आंतरिक रूपांतरण होता है। वह साधारण मनुष्य से देवतुल्य तेज, शांति, साहस और प्रज्ञा प्राप्त करता है। यही शक्ति-पथ का सार है—माँ की कृपा से अपनी ही अंतर्निहित शक्ति का जागरण।

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