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क्यों तुलसी माता का विवाह एक पत्थर से कराया जाता है, जानिए पूरी कथा/शालीग्राम और तुलसी के विवाह की कथा

Tulsi Vivah Knowledge
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  • 1 year ago
  • Mamta Sharma
  • 01 Jan 2025

मंत्र

ॐ श्री मत्पंकजविष्टरो हरिहरौ, वायुमर्हेन्द्रोऽनलः। चन्द्रो भास्कर वित्तपाल वरुण, प्रताधिपादिग्रहाः । प्रद्यम्नो नलकूबरौ सुरगजः, चिन्तामणिः कौस्तुभः, स्वामी शक्तिधरश्च लांगलधरः, कुवर्न्तु वो मंगलम् ॥

देव उठनी एकादशी (Dev Uthani Ekadashi in 2022) के दिन भगवान विष्णु चार महीने की नींद के बाद जागते हैं. इस दिन से हिंदु धर्म में सभी शुभ कार्यों का आरंभ हो जाता है. इसी के साथ इसी एकादशी के दिन तुलसी और शालिग्राम का विवाह (Tulasi and Shaligram Vivah ) किया जाता है. इस विवाह में तुलसी दुल्हन और शालिग्राम दुल्हा बनते हैं. दोनों की शादी मनुष्यों की शादी की तरह ही धूमधाम से की जाती है. . यहां जानिए कि आखिर तुलसी का विवाह एक शालीग्राम नाम के पत्थर से क्यों कराया जाता है. 

शालीग्राम और तुलसी के विवाह (Tulsi Vivah) की कथा

दरअसल शालीग्राम और कोई नहीं बल्कि स्वंय भगवान विष्णु (Lord Vishnu) हैं. पौराणिक कथा के मुताबिक भगवान शिव के गणेश और कार्तिकेय के अलावा एक और पुत्र थे, जिनका नाम था जलंधर. जलंधर असुर प्रवत्ति का था. वह खुद को सभी देवताओं से ज्यादा शक्तिशाली समझता था और देवगणों को परेशान करता था.

जलंधर का विवाह भगवान विष्णु की परम भक्त वृंदा से हुआ. जलंधर का बार-बार देवताओं को परेशान करने की वजह से त्रिदेवों ने उसके वध की योजना बनाई. लेकिन वृंदा के सतीत्व के चलते कोई उसे मार नहीं पाता. इस समस्या के समाधान के लिए सभी देवगण भगवान विष्णु के पास पहुंचे. भगवान विष्णु ने हल निकालते हुए सबसे पहले वृंदा के सतीत्व को भंग करने की योजना बनाई. ऐसा करने के लिए विष्णु जी ने जलंधर का रूप धारण किया और वृंदा का सतीत्व भंग कर दिया. इसके बाद त्रिदेव जलंधर को मारने में सफल हो गए. 

वृंदा इस छल के बारे में जानकर बेहद दुखी हुई और उसने भगवान विष्णु को पत्थर बनने का श्राप दिया. सभी देवताओं ने वृंदा से श्राप वापस लेने की विनती की, जिसे वृंदा ने माना और अपना श्राप वापस ले लिया. प्रायच्क्षित के लिए भगवान विष्णु ने खुद का एक पत्थर रूप प्रकट किया. इसी पत्थर को शालिग्राम नाम दिया गया. वृंदा अपने पति जलंधर के साथ सती हो गई और उसकी राख से तुलसी का पौधा निकला. इतना ही नहीं भगवान विष्णु ने अपना प्रायच्क्षित जारी रखते हुए तुलसी को सबसे ऊंचा स्थान दिया और कहा कि, मैं तुलसी के बिना भोजन नहीं करूंगा. 
इसके बाद सभी देवताओं ने वृंदा के सती होने का मान रखा और उसका विवाह शालिग्राम के साथ कराया. जिस दिन तुलसी विवाह हुआ उस दिन देवउठनी एकादशी (Devuthani Ekadashi) थी. इसीलिए हर साल देवउठनी के दिन ही तुलसी विवाह किया जाने लगा.

तुलसी शालिग्राम विवाह कब है? When is Tulsi Shaligram Vivah 2022?

तुलसी विवाह मानसून के अंत और हिंदू धर्म में शादियों के मौसम की शुरुआत का प्रतीक है। 5 November 2022 शनिवार को इस प्रबोधिनी एकादशी और कार्तिक पूर्णिमा के दिन तुलसी और शालिग्राम का विवाह होगा। तुलसी विवाह वह दिन है जो भगवान विष्णु के अवतार शालिग्राम के साथ पवित्र तुलसी (तुलसी के पौधे) के बीच विवाह के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। तुलसी विवाह या तुलसी विवाह महत्वपूर्ण है क्योंकि यह हिंदू कैलेंडर के अनुसार शादी के मौसम की शुरुआत का प्रतीक है।

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