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स्वास्तिक का महत्व

Swastik kya hai Knowledge
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  • 1 year ago
  • Mamta Sharma
  • 01 Jan 2025

स्वास्तिक शब्द का अर्थ है- शुभ एवं आनन्दकर। इसे गणपति के समान ही माना जाता है।
पूजन के समय यदि गणेश - मृति या पूगीफल (सुपारी) उपलब्ध न हो तो सर्वस्तक का चिन्ह बनाकर उसकी गणपति के रूप में पूजा की जा सकती हैं।

स्वस्तिक के चिन्ह की पूजा करने से हमारा अशुभ शुभ में बदल जाता है, हानि लाभ में बदल जाती हैं और पराजय के स्थान जय लें लेती हैं।

स्वास्तिक की हर रेखा का है विशेष महत्व

स्वास्तिक में चार प्रकार की रेखाएं होती हैं, जिनका आकार एक समान होता है। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार यह रेखाएं चार वेदों - ऋग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद और सामवेद का प्रतीक हैं। आम लोगों का मानना है कि यह रेखाएं चार दिशाओं- पूर्व, पश्चिम, उत्तर एवं दक्षिण की ओर इशारा करती हैं। इन चार रेखाओं की चार पुरुषार्थ, चार आश्रम, चार लोक और चार देवों यानी कि भगवान ब्रह्मा, विष्णु, महेश (भगवान शिव) और गणेश से तुलना की गई है।

भगवान विष्णु की नाभि माना जाता है बिंदु

स्वास्तिक की चार रेखाओं को जोडऩे के बाद मध्य में बने बिंदु को भी विभिन्न मान्यताओं द्वारा परिभाषित किया जाता है। मान्यता है कि यदि स्वास्तिक की चार रेखाओं को भगवान ब्रह्मा के चार सिरों के समान माना गया है, तो फलस्वरूप मध्य में मौजूद बिंदु भगवान विष्णु की नाभि है, जिसमें से भगवान ब्रह्मा प्रकट होते हैं। इसके अलावा यह मध्य भाग संसार के एक धुर से शुरू होने की ओर भी इशारा करता है।

बौद्ध धर्म में स्वास्तिक को अच्छे भाग्य का प्रतीक माना गया है। यह भगवान बुद्ध के पग चिन्हों को दिखाता है, इसलिए इसे इतना पवित्र माना जाता है। यही नहीं, स्वास्तिक भगवान बुद्ध के हृदय, हथेली और पैरों में भी अंकित है।

हिन्दू धर्म से भी ऊपर यदि स्वास्तिक ने कहीं मान्यता हासिल की है तो वह है जैन धर्म। हिन्दू धर्म से कहीं ज्यादा महत्व स्वास्तिक का जैन धर्म में है।

जैन धर्म में यह सातवं जिन का प्रतीक है, जिसे सब तीर्थंकर सुपार्श्वनाथ के नाम से भी जानते हैं। श्वेताम्बर जैनी स्वास्तिक को अष्ट मंगल का मुख्य प्रतीक मानते हैं।

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