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देवउठनी एकादशी

देवउठनी एकादशी कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को कहा जाता है। देवउठनी एकादशी (Dev Uthani Ekadashi Katha) पर भगवान विष्णु को चार महीने की निद्रा के बाद विधि-विधान से पूजा करके जगाया जाता है।

dev uthani ekadashi story Story
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  • 1 year ago
  • Mamta Sharma
  • 23 Nov 2024

कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी का हिंदू धर्म में बहुत महत्व माना जाता है। इसे देवउठनी एकदशी या देवोत्थान प्रबोधनी एकादशी कहा जाता है।

इस बार देव उठनी एकादशी 1 नवंबर 2025 को पड़ रही हैं। इस दिन जगत के पालन कर्ता भगवान श्री हरि विष्णु चार माह की चिर निद्रा के बाद जागते हैं। इस एकादशी के बाद से ही सभी शुभ कार्य जैसे विवाह आदि शुरू हो जाते हैं।

कहा जाता है कि विष्णु जी जागने के पश्चात सबसे पहले तुलसी की प्रार्थना सुनते हैं। इस दिन तुलसी और विष्णु (Tulsi and Vishnu ji Vivah) जी के विग्रह स्वरूप शालीग्राम का विवाह किया जाता हैं।

आइए जानते हैं कि विष्णु जी और तुलसी का विवाह क्यों किया जाता है।

पौराणिक कथा के अनुसार वृंदा भगवान विष्णु की अनन्य भक्त थी। उनका विवाह जलंधर नामक राक्षस से हुआ था। सभी उस राक्षस के अत्याचारों से उद्वविग्न थे। जब देवों और जलंधर के बीच युद्ध हुआ तो वृंदा के सतीत्व के कारण उसे मारना असंभव हो गया था। सभी देवों ने इस बारे में विष्णु जी से सहायता मांगी। विष्णु जी जलंधर का रुप धारण करके वृंदा के समक्ष गए। नारायण को अपना पति समझकर वृंदा पूजा से उठ गई जिससे उनका व्रत टूट गया। परिणाम स्वरुप युद्ध में जलंधर की मृत्यु हो गई।

जब इस बात का पता वृंदा को चला तो उन्होंने विष्णु जी से कहा की हे नारायण में जीवनभर आपकी भक्ति की है फिर आपने मेरे साथ ऐसा छल क्यों किया? विष्णु जी के पास वृंदा के प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं था। वे चुपचाप खड़े होकर सुनते रहे और वृंदा की बात का कोई उत्तर नहीं दिया। उत्तर प्राप्त न होने पर वृंदा ने क्रोधित होकर कहा कि आपने मेरे साथ पाषाण की तरह व्यव्हार किया है। आप पाषाण के हो जाए। वृंदा के द्वारा दिए गए श्राप के कारण नारायण पत्थर के बन गए। जिससे सृष्टि का संतुलन बिगड़ने लगा। तब सभी देवों ने वृंदा से प्रार्थना की। उनकी प्रार्थना को स्वीकार करते हुए वृंदा ने नारायण को क्षमा कर दिया और सती हो गई। उनकी राख से एक पौधा उत्पन्न हुआ तो तुलसी कहलाया। विष्णु जी अपने द्वारा किए गए छल के कारण पश्चाताप में थे। जिसके कारण उन्होंने अपने एक स्वरुप को पत्थर का कर दिया। उसके बाद विष्णु जी ने कहा कि उनकी पूजा तुलसी दल के बिना अधूरी मानी जाएगी। वृंदा का मान रखते हुए सभी देवो ने उनका विवाह पत्थर स्वरुप विष्णु जी से करवा दिया। इसलिए तुलसी और शालीग्राम का विवाह किया जाता है।

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