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संतोषी माता की व्रत कथा

Santoshi Mata Vrat Katha and Puja Vidhi guide to observe 16 Friday fast with rules, benefits, and spiritual story for peace, prosperity, and family happiness.

friday fasting katha Story
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  • 1 month ago
  • Mamta Sharma
  • 16 Apr 2026

मंत्र

ॐ श्री संतोषी महामाया गजानंदम दायिनी शुक्रवार प्रिये देवी नारायणी नमोस्तुते!

संतोषी माता व्रत पूजा विधि (Santoshi Mata Vrat Pooja Vidhi)

सुख-सौभाग्य की कामना से माता संतोषी के 16 शुक्रवार तक व्रत किए जाने का विधान है।

जहाँ संतोष है, वहाँ सुख अपने आप आ जाता है—इसी दिव्य सत्य का साक्षात रूप हैं माता संतोषी। उनके व्रत का विधान केवल एक कर्मकांड नहीं, बल्कि जीवन में धैर्य, श्रद्धा और संतुलन का अभ्यास है।

  • सूर्योदय से पहले उठकर घर की स्वच्छता करें, क्योंकि शुद्धता ही पूजा की पहली सीढ़ी है।
  • स्नान के बाद घर के किसी शांत, पवित्र और स्वच्छ स्थान पर माता संतोषी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
  • माता के समक्ष जल से भरा कलश रखें और उसके ऊपर एक पात्र में गुड़ व चना रखें—यह संतोष और सादगी का प्रतीक है।
  • घी का दीपक प्रज्वलित करें, जो अज्ञान के अंधकार को दूर कर भक्ति का प्रकाश फैलाता है।
  • माता को अक्षत, पुष्प, सुगंध, नारियल और लाल वस्त्र अर्पित करें।
  • गुड़-चने का भोग लगाएँ और पूरे श्रद्धा भाव से माता का स्मरण करें।
  • "संतोषी माता की जय" का उद्घोष करते हुए कथा का आरंभ करें।

संतोषी माता व्रत कथा (Santoshi Mata Vrat Katha in Hindi)

एक समय की बात है, एक वृद्धा माँ थी, जिसके जीवन का सहारा उसका एकमात्र पुत्र था। समय आया और पुत्र का विवाह हुआ, लेकिन विवाह के बाद घर का वातावरण बदलने लगा। वृद्धा अपनी बहू से घर के सभी कार्य करवाती, परंतु उसे पर्याप्त भोजन भी नहीं देती। बहू चुपचाप सब सहती रही—न कोई शिकायत, न कोई विरोध।

पुत्र यह सब देखता था, परंतु माँ के सामने कुछ कहने का साहस नहीं जुटा पाता। अंततः एक दिन उसने निर्णय लिया और माँ से बोला—"माँ, मैं परदेस जाकर अपना भाग्य आजमाना चाहता हूँ।" माँ ने बिना अधिक सोचे उसे जाने की अनुमति दे दी।

वह अपनी पत्नी के पास गया और बोला—"मैं जा रहा हूँ, मुझे अपनी कोई निशानी दे दो।" बहू की आँखें भर आईं। उसने कहा—"मेरे पास देने योग्य कुछ भी नहीं है..." और वह उसके चरणों में गिरकर रोने लगी। उसके आँसुओं और श्रम से सने हाथों की छाप पति के जूतों पर रह गई—वही उसकी सच्ची निशानी बन गई।

पति के जाने के बाद सास के अत्याचार और बढ़ गए। एक दिन अत्यंत दुःखी होकर बहू मंदिर पहुँची। वहाँ उसने देखा—कई स्त्रियाँ श्रद्धा से पूजा कर रही थीं। उसने विनम्रता से पूछा—"आप कौन-सा व्रत कर रही हैं?"

स्त्रियों ने उत्तर दिया—"हम संतोषी माता का व्रत कर रही हैं। यह व्रत सभी कष्टों को दूर करता है और जीवन में सुख-शांति लाता है। शुक्रवार के दिन स्नान कर, गुड़-चने का प्रसाद लेकर माता की पूजा करनी चाहिए। ध्यान रहे—खटाई का त्याग करना अनिवार्य है।"

यह सुनकर बहू के हृदय में आशा की एक किरण जागी। उसने उसी दिन से पूरे नियम और संयम के साथ व्रत आरंभ कर दिया।

समय बीतने लगा... और माता की कृपा धीरे-धीरे प्रकट होने लगी। कुछ ही दिनों में उसके पति का पत्र आया, फिर धन भी प्राप्त हुआ। बहू का विश्वास और गहरा हो गया। उसने मन ही मन प्रण किया—"हे माँ! जब मेरा पति लौट आएगा, तब मैं आपके व्रत का विधिवत उद्यापन करूँगी।"

इधर परदेस में एक रात, माता संतोषी ने उसके पति को स्वप्न में दर्शन दिए और कहा—"तुम अपने घर क्यों नहीं लौटते?" वह बोला—"मेरा सारा सामान अभी नहीं बिका, धन भी नहीं मिला।"

परंतु माँ की कृपा से परिस्थितियाँ पलट गईं। अचानक व्यापार बढ़ा, कर्जदारों ने पैसा लौटाया, और सेठ ने उसे घर जाने की अनुमति दे दी।

घर लौटकर उसने अपनी माँ और पत्नी को धन सौंपा। बहू ने तुरंत उद्यापन की तैयारी शुरू कर दी। परंतु जहाँ सुख होता है, वहाँ ईर्ष्या भी जन्म लेती है। पड़ोस की एक स्त्री ने अपने बच्चों को उकसाया—"भोजन के समय खटाई माँगना।"

उद्यापन के समय जब बच्चे खटाई के लिए जिद करने लगे, तो बहू ने उन्हें पैसे देकर टालना चाहा। परंतु बच्चों ने उन्हीं पैसों से इमली खरीदकर खा ली। यह नियम का उल्लंघन था।

माता अप्रसन्न हो गईं। परिणामस्वरूप राजा के दूत उसके पति को पकड़ने आ पहुँचे। तब किसी ने बहू को बताया कि यह सब खटाई के कारण हुआ है।

बहू ने तुरंत अपनी भूल स्वीकार की और पुनः उद्यापन का संकल्प लिया। इस बार उसने पूरे नियम और श्रद्धा के साथ व्रत पूर्ण किया।

माता प्रसन्न हुईं। कुछ ही समय में उसका जीवन पूर्णतः बदल गया। नौ महीने बाद उसे एक सुंदर पुत्र की प्राप्ति हुई। अब सास, बहू और पुत्र सभी संतोष और आनंद के साथ जीवन व्यतीत करने लगे।

संतोषी माता व्रत का महत्व (Why You Should Do This Vrat)

संतोषी माता का व्रत केवल मनोकामना पूर्ण करने का साधन नहीं, बल्कि जीवन को संतुलित और संतुष्ट बनाने का अभ्यास है। आज के समय में, जहाँ असंतोष और अधीरता बढ़ती जा रही है, यह व्रत हमें सिखाता है—

संतोषी माता व्रत का महत्व (Why You Should Do This Vrat)

संतोषी माता का व्रत केवल मनोकामना पूर्ण करने का साधन नहीं, बल्कि जीवन को संतुलित और संतुष्ट बनाने का अभ्यास है। आज के समय में, जहाँ असंतोष और अधीरता बढ़ती जा रही है, यह व्रत हमें सिखाता है—

  • संतोष ही सच्चा सुख है।
  • धैर्य और श्रद्धा से हर कठिनाई दूर हो सकती है।
  • सरलता और संयम से जीवन में स्थिरता आती है।
  • नियमों का पालन ही सफलता की कुंजी है।

जो व्यक्ति इस व्रत को सच्चे मन से करता है, उसके जीवन में मानसिक शांति, पारिवारिक सुख और आर्थिक स्थिरता का मार्ग स्वतः खुलने लगता है।

संतोषी माता व्रत उद्यापन विधि (Shukravar Vrat Udyapan Vidhi)

16 शुक्रवार विधिवत तरीके से पूजा करने पर ही संतोषी माता व्रत का शुभ फल मिलता है। इसके बाद व्रत का उद्यापन करना जरूरी होता है। उद्यापन के लिए 16वें शुक्रवार यानी अंतिम शुक्रवार को बाकि के दिनों की तरह ही पूजा, कथा व आरती करें। इसके बाद 8 बालकों को खीर-पूरी-चने का भोजन कराएं तथा दक्षिणा व केले का प्रसाद देकर उन्हें विदा करें। अंत में स्वयं भोजन ग्रहण करें। इस दिन घर में कोई खटाई ना खाए, ना ही किसी को कुछ भी खट्टा दें।

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