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बृहस्पतिवार की व्रत कथा

virvar vrat katha Story
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  • 7 months ago
  • Mamta Sharma
  • 10 Jul 2025

मंत्र

ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरुवे नमः। ॐ बृं बृहस्पतये नमः।

Brihaspativar | बृहस्पति देव जी के बीज मंत्र

बृहस्पति देव जी के बीज मंत्रों में से किसी एक का बृहस्पतिवार के दिन 108 बार जाप करना विशेष फलदायी है। पहला मंत्र बृहस्पति देव का मूल मंत्र है, इसकी 108 बार जाप करने से आपकी कुण्डली में स्थित गुरु दोष समाप्त हो जाता है।

ॐ बृं बृहस्पतये नम:।

ॐ क्लीं बृहस्पतये नम:।

ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं स: गुरवे नम:।

ॐ ऐं श्रीं बृहस्पतये नम:।

ॐ गुं गुरवे नम:।

सप्ताह के चौथे दिन गुरूवार या वीरवार को भगवान बृहस्पति देव की पूजा का विधान है। बृहस्पति देवता को बुद्धि और शिक्षा का देव माना जाता है। गुरूवार को बृहस्पति देव की पूजा करने से धन, विद्या, पुत्र तथा मनोवांछित फल की प्राप्ति के साथ परिवार में सुख तथा शांति बनी रहती है। गुरूवार का व्रत जल्दी विवाह करने के लिये भी किया जाता है।

गुरूवार व्रत की विधि - Brihaspativar vrat ki katha

व्रत वाले दिन प्रात: काल उठकर बृहस्पति देव का पूजन पीली वस्तु, पीले फूल, चने की दाल, पीली मिठाई, पीले चावल आदि का भोग लगाकर किया जाता है. इस व्रत में केले का पूजन ही करें. कथा और पूजन के समय मन, कर्म और वचन से शुद्घ होकर मनोकामना पूर्ति के लिए  बृहस्पति देव से प्रार्थना करनी चाहिए. दिन में एक समय ही भोजन करें. भोजन चने की दाल आदि का करें, नमक न खा‌एं, पीले वस्त्र पहनें, पीले फलों का प्रयोग करें, पीले चंदन से पूजन करें। पूजन के बाद भगवान बृहस्पति की कथा सुननी चाहिये।

गुरूवार व्रत की कथा (Brihaspati Dev Vrat Katha)

एक समय भारतवर्ष में एक प्रतापी राजा राज्य करता था। वह अत्यन्त धर्मात्मा एवं दानी महापुरुष था। वह नित्यप्रति नियमपूर्वक मन्दिर में पूजा और ब्राह्मण, गुरुओं की सेवा किया करता था। उसके द्वार से कोई भी दुःखी याचक निराश होकर नहीं लौटता था। राजा प्रत्येक बृहस्पतिवार को व्रत रखता और पूजन किया करता था। वह प्रत्येक दिन गरीबों की हर प्रकार से मदद करता था। राजा की रानी राजा के व्यवहार के बिल्कुल विपरीत थी। उसे यह सब पसन्द नहीं था। उसे यह सब करने में आलस्य आता था। ना तो वह व्रत रखती और ना ही किसी गरीब की सहायता करती। राजा को भी यह सब करने से रोकते हुए कहती- "ये सब व्यर्थ के कार्य हैं, राजन! ये सब आपको शोभा नहीं देता। समय और धन का तुम दुरुपयोग कर रहे हो। जो एक राजा का कर्त्तव्य नहीं है।"

एक दिन राजा शिकार खेलने की इच्छा से वन को चला गया। पीछे महल में रानी और दासी थीं। उसी समय गुरू महाराज बृहस्पतिदेव साधु वेष में रानी के द्वार पहुंचकर भिक्षा मांगने लगे। साधु की आवाज सुन रानी द्वार पर आ साधु से कहने लगी- "हे साधु महाराज ! मैं इस दान-पुण्य के कार्यों से तंग आ चुकी हूं, इस कार्य के लिए तो मेरे पति ही काफी हैं, मैं तो यह चाहती हूं, किसी तरह यह धन नष्ट हो जाये और मैं आराम से रह सकूं।"

साघु के वेष में बृहस्पतिदेव बोले- "हे देवी! तुम तो बड़ी विचित्र नारी हो। सन्तान और धन से कभी कोई मनुष्य दुःखी नहीं होता, इनको सभी चाहते हैं। पापी भी पुत्र और धन की इच्छा करते हैं, तुम्हारे पास धन की अधिकता है तो इस धन का सदुपयोग करो। भूखों को भोजन कराओ, प्याऊ लगवाओ, अनाथों-अपाहिजों के लिए दान दो, ब्राह्मणों को दक्षिणा दो, धर्मशालाओं का निर्माण कराओ, कुंआ-तालाब- बावड़ी, बाग-बगीचों आदि का निर्माण कराओ तथा निर्धनों की सहायता करो। कुंवारी कन्याओं का विवाह कराओ, यज्ञ आदि धार्मिक कार्य करो। इस प्रकार के कर्मों को करने से आपके कुल का उत्थान होगा, उसकी कीर्ति फैलेगी एवं तुम्हें स्वर्ग की प्राप्ति होगी।"

लेकिन आलसी रानी को ये बातें प्रिय नहीं लगीं। वह बोली- "हे साधु | महाराज ! मुझे ऐसा धन कदापि नहीं चाहिए, जिसे मैं दूसरों को बांटती फिरू, तथा जिसके उपयोग में ही मैं अपना आरामदेह समय गंवाती रहा करूं।"

तब साधु ने रानी से कहा- "हे देवी! यदि तुम धन से इतनी ही दुःखी हो, तो मैं तुम्हें धन से मुक्ति पाने का एक उपाय बताता हूं। तुम ऐसा ही करना जैसा मैं कहूं। बृहस्पतिवार को घर गोबर से लीपना, अपने वालों को पीली। मिट्टी से धोना, बालों को धोते समय स्नान करना, नाखून काटना, राजा से कहना कि वह हजामत बनवाये, भोजन में मांस-मदिरा का प्रयोग करे। कपड़े धोबी से धुलवाना। इस प्रकार के कार्यों को केवल सात बृहस्पतिवार करने से तुम्हें धन से मुक्ति मिल जायेगी।"

यह कहकर साधु वेष में बृहस्पति देवता चले गये। रानी ने साधु के कहे अनुसार सात बृहस्पतिवार तक ऐसा ही करने का निर्णय किया। साधु के कहे अनुसार करते हुए रानी को केवल तीन बृहस्पतिवार ही बीते थे कि राजा की सारी धन-सम्पत्ति नष्ट हो गई। महल में भोजन के लिए अनाज नहीं रहा।

तब दुःखी होकर राजा रानी से कहने लगा- "हे रानी ! मैं दूसरे देश में कुछ कमाने जाता हूं, तुम यहां पर दासी के साथ रहो। क्योंकि यहां मुझे हर मनुष्य जानता है, मैं यहां कोई कार्य नहीं कर पाऊंगा। देश चोरी, परदेश भीख बराबर है।"

ऐसा कहकर राजा दूसरे देश चला गया। वह रोज जंगल में लकड़ी काटता और शहर आकर बेच देता। इस तरह वह अपना जीवन यापन करने लगा। इधर राजा के बिना रानी और दासी दुःखी रहने लगीं। किसी दिन भोजन मिल जाता तो खा लेतीं और कभी भोजन उपलब्ध ना होने पर केवल जल ही पीकर सो जातीं।
"एक दिन रानी और दासी को सात दिन भूखे ही व्यतीत हो गये तो रानी दासी से बोली-"हे दासी ! यहां पास ही के नगर में मेरी बहन रहती है, जो बहुत धनवान है। तू उसके पास जा और पांच सेर अनाज मांग ला, उससे कुछ दिन तो भोजन मिलेगा।"

दासी रानी की बहन के पास पहुंची। उस दिन बृहस्पतिवार था और रानी की बहन पूजा में मग्न थी। दासी ने कहा- "हे रानी ! मुझे आपकी बहन ने भेजा है, मुझे पांच सेर अनाज दे दो।" दासी ने अपनी बात कई बार दोहराई। | परन्तु रानी ने कोई उत्तर नहीं दिया। क्योंकि उस समय रानी बृहस्पतिवार की कथा सुन रही थी।

जब रानी ने दासी को कोई उत्तर नहीं दिया तो वह अत्यन्त दुःखी हुई और उसे गुस्सा भी आया। वह वापस लौटकर अपनी रानी से बोली-"हे रानी, आपकी बहन बहुत ही धनी स्त्री है, वह छोटे लोगों से बात नहीं करती। वह धन के मद में चूर है। उसने मेरे कई बार आग्रह करने पर भी कोई उत्तर नहीं

दिया तो मैं वापस चली आई।" रानी अपनी दासी को दुखी देखकर बोली-"हे दासी, इसमें उसका कोई दोष नहीं है। जब मनुष्य का बुरा वक्त आता है तो सारे सगे-सम्बन्धी मुख मोड़ लेते हैं, कोई सहारा नहीं देता। अच्छे, बुरे का पता विपत्ति में ही लगता है। जो भगवान को मंजूर होगा वही होगा, इसमें किसी का कोई दोष नहीं।"

उधर रानी की बहन ने कथा सुनकर सोचा- मेरी बहन की दासी आयी थी, भगवान बृहस्पतिदेव की कथा सुनने के कारण मैं उससे बोली नहीं और वह दुःखी हो वापस लौट गई।

वह अपनी बहन के घर जाकर कहने लगी- "हे बहन ! मैं बृहस्पतिवार की व्रत कथा सुन रही थी। कथा के समय किसी से नहीं बोलते और ना ही अधूरी कथा बीच में छोड़ते हैं। इसीलिए मैं तुम्हारी दासी से तब बात ना कर सकी। कहो बहन, तुमने दासी को क्यों भेजा था?"
रानी अपनी बहन से बोली-'"बहन। हमारे घर में अनाज का एक दाना भी नहीं है। तुम तो सारी बात जानती हो, सात दिन से हम भूखे हैं। इसीलिए मैंने अपनी दासी को तुमसे पांच सेर अनाज लेने भेजा था।"

रानी की बात सुनकर रानी की बहन बोली- "बहन, बृहस्पतिदेव सब | मनोरथों को पूर्ण करने वाले हैं। देखो शायद तुम्हारे घर में अनाज रखा हो। " यह सुनकर दासी अन्दर गई तो एक घड़ा भरा अनाज रखा मिला। उसे बड़ा आश्चर्य हुआ क्योंकि उसने एक-एक बर्तन देखा था। सारे बर्तन खाली थे, तो ये अनाज का भरा घड़ा यहां कैसे आ गया? वह सोचने लगी। उसने बाहर आकर रानी को बताया।

बहन ने रानी और दासी को बताया कि घड़ा भर अनाज भगवान- बृहस्पतिदेव की कृपा से आया है। यह सुनकर दासी ने रानी से कहा- "हे रानी! देखो, जब हमें अन्न नहीं। | मिलता तो हम कई रोज तक भूखे रहते हैं। अगर सप्ताह में एक दिन भूखे रहकर (व्रत रखकर) यदि छः दिन भोजन मिले तो क्या बुराई है? आप अपनी बहन से व्रत की विधि पूछ लीजिए। हम भी व्रत को विधिपूर्वक करेंगे।" दासी के आग्रह पर रानी ने अपनी बहन से बृहस्पतिवार के व्रत की विधि पूछी।

उसकी बहन बोली- "हे बहन ! बृहस्पतिदेव का व्रत बेहद सरल है। इस व्रत हेतु बृहस्पतिवार को चने की दाल व गुड़ से विष्णु भगवान की केले की जड़ में पूजा करते हैं और दीपक जलाते हैं। इस दिन पीले वस्त्र पहनें और पीला भोजन करें तथा पहले कथा सुनें। इस प्रकार गुरु बृहस्पतिदेव प्रसन्न होकर अन्न, धन तथा पुत्र देते हैं।"

व्रत और पूजन की विधि बताकर रानी की बहन अपने घर चली गई। रानी और दासी ने निश्चय किया कि वे बृहस्पतिवार का व्रत अवश्य करेंगी। जब बृहस्पतिवार आया तो उन्होंने व्रत रखा। वे घुड़साल में जाकर गुड़-चना बीन लाई और उससे केले की जड़ का पूजन किया। अब समस्या थी पीले भोजन की। पीला भोजन कहां से आये? दोनों बहुत दुःखी हुई परन्तु

भगवान बृहस्पतिदेव उनके व्रत से प्रसन्न हुए वे एक साधारण व्यक्ति के रूप में दो थालों में सुन्दर पीला भोजन लेकर आये और दासी को देकर बोले- “हे दासी ! यह भोजन तुम्हारे और रानी के लिए है। अतः तुम दोनों यह भोजन कर लो।" रानी को भोजन के विषय में कोई जानकारी नहीं थी। दासी अपनी रानी के पास जाकर बड़ी प्रसन्नता से बोली-"रानी जी ! भोजन कर लो।” रानी दासी से बोली- "जा तू ही कर ले भोजन।"

दासी बोली- "हे रानी ! एक व्यक्ति भोजन दे गया है। " रानी बोली- "वह व्यक्ति तेरे ही लिए भोजन दे गया है, जा तू ही कर ले भोजन।" दासी ने कहा- "नहीं रानी ! वह केवल मेरे लिए नहीं, हम दोनों के लिए, दो थालों में अत्यधिक स्वादिष्ट भोजन दे गया है। आईये भोजन ग्रहण कीजिए।"

दोनों ने गुरु बृहस्पतिदेव को नमस्कार कर भोजन प्रारम्भ किया। उसके बाद वे प्रत्येक बृहस्पतिवार को विधिपूर्वक व्रत करने लगीं। बृहस्पतिदेव की कृपा से उनके पास पहले के ही समान धन हो गया।

परन्तु धन ने फिर से रानी को आलसी बना दिया। तब दासी बोली- "देखो रानी ! तुम पहले भी इसी आलस्य के वशीभूत होकर धन नष्ट कर चुकी हो। अब गुरु महाराज की कृपा से फिर सुख के दिन लौटे हैं, तो तुमने फिर से आलस्य का दामन थाम लिया है। बड़ी मुसीबतों के उपरान्त हमें धन की प्राप्ति हुई है। अतः हमें अब दान-पुण्य करना चाहिए।"

दासी की बात मानकर रानी भूखों को भोजन कराने लगी। उसने प्याऊ लगवाये, ब्राह्मणों को धन दिया, अपाहिजों और अनाथों को दान दिया, कुएं, तालाब- बावड़ी, बाग-बगीचे लगवाये, मन्दिरों, पाठशालाओं, धर्मशालाओं का। | निर्माण कराया, निर्धनों को धन दिया, कुंवारी कन्याओं की शादी करवाई। उसने अपना काफी धन शुभ कार्यों में खर्च किया, जिससे रानी की प्रसिद्धि फैलने लगी। उसके कुल की कीर्ति बढ़ने लगी। दासी की बात मानने से उसके पितृ भी अत्यन्त प्रसन्न हुए। अपने अच्छे कर्मों व बृहस्पतिदेव के व्रत से रानी। की बुद्धि ठीक हो गई। एक दिन रानी और दासी आपस में विचार करने लगीं। कि ना जाने राजा किस हाल में और किस दशा में होंगे। राजा की कोई भी खोज खबर उन्हें नहीं थी।

उन्होंने राजा के लिए गुरु बृहस्पतिदेव से प्रार्थना की। गुरु महाराज रात में राजा को स्वप्न में दिखे और बोले- "हे राजन उठ ! तेरी रानी तुझे याद करती है। अपने देश लौट जा।'

राजा प्रातः काल उठकर अपने स्वप्न के विषय में विचार करने लगा। | भगवान की बात याद कर उसने सोचा- "लौटने हेतु कुछ धन तो होना चाहिए। आज तक मैंने किन-किन मुसीबतों से अपने दिन व्यतीत किये हैं यह मैं ही। जानता हूं।" अपने बुरे समय को याद कर राजा रोने लगा। तभी वहां बृहस्पतिदेव साधु वेष में प्रकट हुए और राजा से बोले- "हे

लकड़हारे ! तुम इस वीरान जंगल में क्या कर रहे हो? किस चिन्ता में इस तरह बैठे रो रहे हो, मुझे बताओ।"

साधु की बात सुन राजा हाथ जोड़कर बोला- "हे प्रभो ! आप सब कुछ जानते हैं।"

इतना कहकर राजा ने साधु को अपनी सम्पूर्ण कहानी कह सुनाई ।। साधु के रूप में भगवान उसके वचनों को सुन कहने लगे- "हे राजा ! तुम्हारी पत्नी ने बृहस्पतिदेव के प्रति जो अपराध किया था, उसी कारण तुम्हारी | यह दशा हुई है। अत: तुम अब चिन्ता छोड़कर बृहस्पतिदेव का व्रत करो। भगवान बड़े दयालु हैं, तुम्हारी अवश्य सुनेंगे। तुम चने की दाल, गुड़ व जल से भरे लोटे से केले की जड़ में बृहस्पति देव का पूजन करो, फिर कथा कहो। | या सुनो। भगवान बृहस्पति देव तुम्हारे कष्टों को हरकर तुम्हारी सभी | मनोकामनाओं को पूर्ण करेंगे।"

साधु की बात सुनकर राजा बोला- "हे प्रभो ! मुझे लकड़ी बेचकर भोजन करने के लिए भी पर्याप्त धन नहीं मिलता तो मैं व्रत कैसे करूं? मुझे रात स्वप्न में अपनी पत्नी अत्यन्त व्याकुल दशा में दिखाई दी थी। मेरे पास कोई साधन नहीं जो मैं उसका हाल जान सकूं।"

साधु विनम्र वचनों से राजा से बोला- "हे राजन! तुम किसी बात की। चिन्ता मत करो। बृहस्पतिवार के दिन तुम रोज की ही तरह लकड़ियां शहर | में बेचने जाना। तुम्हें रोज से दुगना धन प्राप्त होगा। उस धन से तुम बृहस्पति | देव का पूजन कर मुझसे सुनी हुई कथा कहना। भगवान बृहस्पति देव तुम्हारी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करेंगे।

"साधु महाराज ने कथा शुरू की-

बहुत समय पहले की बात है, एक नगर में एक निर्धन ब्राह्मण रहता था। वह सन्तानहीन था। वह प्रतिदिन पूजा-पाठ करता था परन्तु उसकी स्त्री नास्तिक थी। ना तो वह स्नान करती थी, ना ही किसी देवता को पूजती थी। सुबह उठते ही भोजन करना उसकी दिनचर्या थी।

अपनी पत्नी के इस आचरण से ब्राह्मण बहुत दुःखी था। वह अपनी पत्नी को समझा-समझा कर थक गया था, परन्तु परिणाम वही ढाक के तीन पात रहे।

ब्राह्मण की -अर्चना से प्रसन्न हो, एक दिन भगवान ने ब्राह्मण को पूजा- | पुत्री प्राप्ति का वरदान दिया। नौवे मास ब्राह्मण के घर एक कन्या का जन्म | हुआ। वह अपने पिता की छत्रछाया में बढ़ने लगी। वह कन्या अत्यन्त धार्मिक प्रवृत्ति की थी। वह प्रातः उठकर भगवान विष्णु का जप किया करती थी।

उसने बृहस्पतिवार के व्रत भी करने शुरू कर दिये थे। प्रातः पूजा कर | स्कूल जाती तो मुट्ठी भर जौं सारे रास्ते पाठशाला तक डालती जाती और लौटते समय वही जाँ स्वर्ण के हो जाते तो उन्हें बीनकर घर ले आती। उसका प्रतिदिन का यही नियम था। एक दिन वह सूप में उन सोने के जौं को साफ कर रही। थी। उसकी मां ने जब अपनी लड़की को देखा तो बोली-

“हे पुत्री ! सोने के जौं साफ करने के लिए सोने का ही सूप होता तो क्या ही अच्छा होता !

दूसरे दिन बृहस्पतिवार (गुरुवार) था। वह कन्या व्रत रखकर पूजन, कथा के समय बृहस्पतिदेव से प्रार्थना करने लगी- "हे महाप्रभु गुरुदेव ! यदि मैं शुद्ध मन, कर्म, वचन से आपकी पूजा अर्चना करती हूं, तो आप मुझे सोने का सूप | देने की कृपा करें।"

बृहस्पतिदेव उस बालिका की पूजा से प्रसन्न थे। उन्होंने उस कन्या की प्रार्थना स्वीकार कर ली। प्रतिदिन की तरह वह कन्या जौं बिखेरती हुई चली। | गई। जब वह लौटते समय जौं बीन रही थी तो उसे सोने का सूप भी रास्ते में ही पड़ा हुआ मिल गया। बृहस्पतिदेव की कृपा से वह अत्यन्त प्रसन्न थी। एक दिन वह बालिका सोने के सूप में सोने के जौं साफ कर रही थी, उसी समय उस नगर का राजकुमार वहां से होकर जा रहा था। वह उस कन्या के रूप पर मोहित हो गया। राजमहल में जाकर उसने अन्न-जल त्याग दिया और उदास भाव से अपने शयनकक्ष में पड़ा रहा। जब यह समाचार राजा को मिला तो वो चिन्तित हो मंत्रियों सहित राजकुमार के शयनकक्ष में पहुंचा और अपने पूछा- पुत्र के पास जाकर "हे पुत्र ! क्या बात है? तुम्हें क्या कष्ट है? क्या तुम्हारा किसी ने अपमान किया है या अन्य कोई कारण है? मुझसे कहो। मैं वही करूंगा, जिससे मेरे प्रिय पुत्र की खुशियां लौट आयें।" राजकुमार अपने पिता की चिन्तित वाणी सुनकर बुझे-बुझे से स्वर में बोला- "हे पिताश्री ! मुझे आपकी छत्रछाया में किसी प्रकार का कोई दुःख नहीं है। ना ही मेरा किसी ने अपमान किया है, मैं तो उस लड़की से विवाह करना। चाहता हूं, जो सोने के सूप में सोने के जो फटक रही थी।" अपने पुत्र की बात सुनकर राजा को घोर आश्चर्य हुआ और बोला- "हे पुत्र ! उस लड़की का पता हमें बताओ। मैं अवश्य ही तुम्हारा विवाह उस कन्या से करा दूंगा।" अपने पिता के वचनों को सुन राजकुमार ने अपने पिता से सारा वृत्तान्त कह सुनाया। राजा ने अपने मन्त्री को उस लड़की के घर भेजा तथा कहा- "उस ब्राह्मण से कहो कि हम अपने पुत्र का विवाह उसकी पुत्री से करना चाहते हैं।"

मंत्री ब्राह्मण के घर पहुंचा और उसे राजा का आदेश कह सुनाया। कुछ ही दिन के बाद ब्राह्मण की पुत्री का विवाह राजा के पुत्र से विधिवत् सम्पन्न हुआ।
सौभाग्यवती पुत्री के विदा हो जाने के उपरान्त ब्राह्मण के घर में फिर वही गरीबी निवास करने लगी। दोनों समय का भोजन भी मुश्किल से मिलता था। जब एक दिन घर में बनाने को अन्न का एक दाना तक नहीं था तो मजबूर होकर ब्राह्मण अपनी पुत्री से मिलने गया। अपने पिता की दीन-हीन दशा देखकर वह बहुत दुःखी हुई और उसने अपनी मां का हाल पूछा तो ब्राह्मण ने सारी दशा कह सुनाई। अपनी मां के विषय में सुनकर उसे बहुत गुस्सा आया। अपने पिता की दशा में सुधार करने के विचार से पिता को बहुत सा धन देकर विदा किया। कुछ समय सुखपूर्वक बिताकर ब्राह्मण फिर उसी दीन दशा में पहुंच गया। ब्राह्मण फिर अपनी पुत्री के पास पहुंचा और सारा हाल अपनी पुत्री को कह सुनाया। पिता की बात सुनकर उसकी पुत्री बोली- "हे। पिताजी ! आप माताजी को कृपया यहां लेकर आयें। मैं उन्हें वह विधि विस्तारपूर्वक बता दूंगी, जिससे गरीबी दूर हो जायेगी।"

ब्राह्मण देवता वापस अपने घर पहुंचे और अपनी पत्नी को अपनी पुत्री के पास राजमहल लेकर पहुंचे। लड़की ने अपनी मां को समझाया- "हे मां ! तुम प्रातः उठकर स्नानादि करके, विष्णु भगवान की पूजा करने के पश्चात् ही भोजन ग्रहण किया करो। तभी दरिद्रता दूर होगी।" परन्तु उसकी बुद्धि पर अपनी पुत्री के उपदेशों का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। एक दिन उसकी पुत्री को बहुत क्रोध आया।
अगले दिन बृहस्पतिवार था। उसने अपने पिता की कोठरी उसी रात खाली करवाकर अपनी मां को उसमें बन्द कर दिया। प्रातः ही कोठरी खोलकर अपनी। मां की स्नान करवाकर पूजा-पाठ करवाया। प्रभु की कृपा से उसकी मां की बुद्धि ठीक हो गई और वह हर बृहस्पतिवार के व्रत करने लगी।

इस व्रत के प्रभाव से उसकी मां को पुत्र एवं धन की प्राप्ति हुई और मृत्यु के पश्चात् दोनों पति-पत्नी को मोक्ष की प्राप्ति हुई। राजा को बृहस्पतिदेव की कथा सुनाकर साधु अन्तर्ध्यान हो गये। धीरे-धीरे समय व्यतीत होने लगा। बृहस्पतिवार के दिन राजा जंगल से लकड़ी काटकर शहर में बेचने गया। वहां उसे लकड़ियों के अच्छे दाम मिले।

राजा ने बचे धन से चना, गुड़ व अन्य सामग्री लेकर बृहस्पतिदेव का व्रत व पूजन किया। उस दिन से उसके सारे कष्ट मिट गये। परन्तु अगले गुरुवार को वह व्रत करना भूल गया। इस कारण बृहस्पतिदेव भगवान नाराज हो गये। उस दिन उस नगर के राजा ने एक भव्य यज्ञ तथा भोज का आयोजन किया था। समस्त नगर राजा के आदेश पर भोजन करने राजा के महल पर गया क्योंकि राजा का आदेश था कि जो मनुष्य घर में चूल्हा जलायेगा उसे फांसी दे दी जायेगी।

लकड़हारा कुछ देर से पहुंचा था इसलिए राजा स्वयं उसे अपने साथ महल में ले गये और भोजन कराया, परन्तु बृहस्पतिदेव के प्रकोप से रानी को अपना हार खूंटी पर नहीं दिखा। रानी को यह विश्वास हो गया कि उसका हार उस लकड़हारे ने ही चुराया है।
लकड़हारे को बन्दी बनाकर जेल में डाल दिया गया। जब लकड़हारा जेलखाने में गया तो दुःखी मन से विचार करने लगा कि ना जाने कौन से पूर्वजन्म पापों की सजा मुझे मिल रही है। ठीक उसी समय राजा को उस साधु महात्मा की याद आई जो उसे जंगल में मिला था।- 
उसके बाद वृहस्पतिदेव साधु रूप में प्रकट हो राजा की दीन दशा को देखकर बोले- "हे मूर्ख ! तूने बृहस्पतिदेव की कथा नहीं कही, तू उनकी पूजा से विमुख हुआ, इसीलिए तुझे दारुण दुःख प्राप्त हुआ है। तू चिन्ता मत कर, बृहस्पतिवार को तुझे जेल के दरवाजे पर चार पैसे मिलेंगे। तू उनसे गुड़-चना मंगाकर बृहस्पतिवार की कथा कहना। तेरे सभी कष्ट मिट जायेंगे।"
ऐसा कहकर साधु अन्तर्ध्यान हो गये। अगले दिन बृहस्पतिवार था। जेल के द्वार पर राजा को चार पैसे मिले। उसने गुड़-चना मंगाकर बृहस्पतिवार की कथा कही और प्रसाद बांटा। उसी दिन बृहस्पतिदेव उस राज्य के राजा को स्वप्न में दिखे और उसको चेतावनी दी- "हे राजा ! तूने जिस निरपराध को बन्दी बनाकर जेल में बन्द कर रखा है वह एक राजा है। उसे छोड़ दे। रानी का हार यथास्थान खूंटी पर टंगा है। अगर तूने मेरी आज्ञा नहीं मानी तो मैं तेरा राज-पाट नष्ट कर दूंगा।" राजा प्रातः काल उठा और खूंटी पर टंगे हार को देखकर तुरन्त सिपाहियों) से लकड़हारे को बुलाया और क्षमा मांगी तथा उसे राजा के योग्य सुन्दर वस्त्र और आभूषण देकर विदा किया।

गुरु महाराज की आज्ञा अनुसार राजा अपने नगर को चल दिया। राजा जब अपने नगर के निकट पहुंचा तो उसे अत्यधिक आश्चर्य हुआ। नगर में पहले से अधिक बाग, तालाब और कुएं तथा बहुत सी धर्मशालाएं, मन्दिर आदि बने हुए थे। राजा ने एक व्यक्ति को रोककर पूछा-“ऐ सुनो ! ये धर्मशालाएं और बाग किसने बनवाये हैं? "
वह मनुष्य बोला- "ये बाग-बगीचे, धर्मशालाएं, पाठशालाएं यहां की रानी और दासी ने बनवाये हैं।' यह सुनकर राजा को अत्यधिक क्रोध आया। रानी के पास जब यह खबर पहुंची कि राजा आ रहे हैं तो उसने अपनी दासी से कहा- "हे दासी ! राजा जी हमें अत्यन्त दीन-हीन दशा में छोड़कर गये थे। वह हमारी ऐसी हालत देखकर लौट ना जायें। तू बाहर जाकर द्वार पर खड़ी हो जा।"
दासी द्वार पर जाकर खड़ी हो गई। राजा जब आये तो दासी उन्हें रानी की आज्ञानुसार अन्दर लिवा लाई । राजा तो अत्यन्त क्रोधित था। उसने तुरन्त | अपनी तलवार खींच ली और रानी से पूछा- "बता रानी ! तेरे पास इतना धन कहां से आया? मैं तो तुझे बहुत दीन-हीन दशा में छोड़कर गया था।" रानी राजा से बोली- "हे नाथ ! आप सही कह रहे हैं। यह सब धन हमें बृहस्पति देव की कृपा से प्राप्त हुआ है।" रानी की बात सुनकर राजा का क्रोध समाप्त हो गया, उसने निश्चय किया कि सब तो सप्ताह में एक बार कथा कहते हैं, मैं दिन में तीन बार कथा करूंगा। उसके बाद, हर समय राजा के दुपट्टे से चने और गुड़ बंधे रहते थे। वह दिन में तीन बार कथा करने लगा।
एक दिन राजा ने अपनी बहन को लिवा लाने का विचार किया। इस तरह का निश्चय कर रानी से कहकर चल दिया। मार्ग में उसने देखा, वृद्ध लोग मुर्दे को लिए राम नाम सत्य है' कहते जा रहे हैं। उन्हें रोककर राजा बोला- "हे भले मानसो ! मेरी बृहस्पतिवार की कथा सुन लो।" वे सभी बोले - "यहां हमारा आदमी मर गया, इसे अपनी कथा की पड़ी है। हमें नहीं सुननी तेरी कथा" परन्तु एक वृद्ध आदमी बोला- "अच्छा कहो ! हम तुम्हारी कथा भी सुनेंगे कहो भाई अपनी कथा कहो।"

राजा ने चने, गुड़ निकालकर कथा आरम्भ की मुर्दा हिलने लगा। कथा समाप्त होने पर मुर्दा 'राम-राम' करता उठ बैठा। लोग आश्चर्यचकित हो कथा के चमत्कार के प्रति नतमस्तक हो गये। राजा अपने घोड़े पर सवार होकर आगे बढ़ा। आगे उसे एक खेत पर किसान मिला। राजा किसान से बोला- “भैय्या ! जरा ठहरो, तुम मुझसे भगवान बृहस्पति देव की कथा सुन लो।"
किसान राजा से बोला-"आगे जाओ भैय्या ! जितनी देर में मैं तुम्हारी कथा सुनूंगा उतनी देर । में तो मैं चार बार खेत जोत लूंगा। नहीं भाई, मुझे नहीं सुननी तुम्हारी कथा।" किसान के ऐसा कहते ही उसके बैल पछाड़ खाकर गिर पड़े। खुद किसान भयंकर पेट दर्द से तड़पने लगा। तभी किसान की पत्नी खेत पर रोटी लेकर पहुंची। चिन्तित होकर उसने अपने पुत्र से पूछा- "हे पुत्र ! क्या हुआ तेरे पिता को? ये अभी तो अच्छे-भले थे।” तब लड़के ने अपनी मां को सारी बात बताई। वह दौड़कर राजा के करीब पहुंचकर बोली - "हे राजन! रुको, मैं सुनूंगी तुम्हारी कथा, परन्तु कथा मेरे खेत पर चलकर कहनी होगी।"
राजा खेत पर पहुंचा और उसने चने और गुड़ हाथ में लेकर कथा कही, प्रसाद बांटा। किसान के बैल पुनः जीवित हो गये और किसान भी स्वस्थ हो गया। राजा सीधा अपनी बहन के घर पहुंचा। बहन ने अपने राजा भैय्या की बहुत आवभगत की।
राजा की अभी एक समय की कथा बाकी थी। वह अपनी बहन से बोला- "बहन ! मुझे कथा कहनी है। तुम कोई ऐसा मनुष्य ले आओ जिसने कुछ न खाया हो। उसे ही मैं कथा सुना सकता हूं।" अपने भाई की बात सुन राजा की बहन बोली- "भैय्या ! हमारे नगर में तो सभी सबसे पहले भोजन करते हैं। तत्पश्चात ही कुछ कार्य करते हैं। ऐसे में कोई भूखा तो मिलना कठिन है। फिर भी मैं देखती हूं।"
ऐसा कहकर राजा की बहन किसी भूखे व्यक्ति की टोह में निकल पड़ी। सारा नगर छान मारा। परन्तु ऐसा कोई नहीं मिला जो बिना खाये हो। अन्त में वह एक गरीब किसान के घर पहुंची। वहां पर उस किसान का पुत्र अत्यन्त बीमार था। इसलिए तीन दिन से किसान ने कुछ नहीं खाया था। उसने तुरन्त अपने भाई को वहीं बुला लिया और कथा कहने को कहा। किसान ने राजा की कथा सुनी तो उसका बीमार लड़का सही हो गया।

राजा की प्रशंसा पूरे नगर में होने लगी। राजा अपनी बहन से बोला- "हे बहन ! मैं अपने घर जाऊंगा। तुम भी मेरे साथ चलो।" राजा की बहन अपनी सास से पूछने पहुंची- 'माता जी ! मेरे भैय्या मुझे अपने साथ ले जाना चाहते हैं।" राजा की बहन की सास ने कहा- 'तू तो चली जा परन्तु बच्चों को मत ले जाइयो । तेरी भाभी निपूती है।"

राजा की बहन ने सारी बात अपने भैय्या से कह दी। अपनी बहन की बात सुनकर राजा बोला- 'जब बच्चे ही नहीं जायेंगे, तो तू क्या करेगी? तू भी यहीं रह । " राजा दुःखी मन से वापस लौट आया। घर आकर उसने अपनी पत्नी से सारी बात बताई। वह भी अत्यन्त दुःखी हुई। रानी बोली- 'हे बृहस्पतिदेव ! आपकी अनुकम्पा से हम सर्वसुखी हैं। हे प्रभो ! मुझे पुत्र भी दे दो तो मुझ पर लगा कलंक घुल जायेगा।"

बृहस्पतिदेव ने उसकी प्रार्थना सुन ली। नवें मास रानी के एक सुन्दर पुत्र पैदा हुआ। राजा की बहन भी आई। तब रानी ने ताना मारा-"घोड़ा चढ़ी ना आई, गधों चढ़ी आई।" राजा की बहन बोली-"यदि मैं इस प्रकार ना कहती, तो तुम माता कैसे बनतीं?" हे बृहस्पति देव ! आपने जिस प्रकार राजा को सर्वसुख सम्पन्न किया। उसी तरह सभी को सुख देना।

॥ बोलो भगवान बृहस्पतिदेव की जय ॥

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