Giriraj ji Maharaj ki Aarti - श्री गिरिराज महाराज की आरती

Bhagwan Giriraj ji ki aarti from Mathura
Giriraj ji Maharaj ki Aarti

श्री गिरिराज महाराज की आरती

ॐ जय गिरिराज हरी, स्वामी जय गिरिराज हरी । <\br> शरण तुम्हारी आये, करुणापूर्ण करि ।। ॐ <\br> <\br> उपल देह से प्रगटे, भक्तन हितकारी स्वामी। इच्छा पूरण करते, तुम अन्तयाम। ॐ. नील वरण तन सुन्दर, बोलसमुद्र वाणी प्रेम भरी हरी चितवन, निरखत छवि ॥ ॐ... <\br> <\br> मोर मुकुट सिर सोहत मस्त पर चन्दन। गल वैजन्ती माला, काटे भव बन्दन।। ॐ... <\br> <\br> जामा स्वेत मनोहर, पटका है पीला। अधरन वंशी बाजे, करते नर लीला।। ऊँ... <\br> <\br> कोप कियो जब सुरपति, बृज पर अति भारी। मान घटाओ तुमने, सन्तन हितकारी ।। ॐ... <\br> <\br> बृजवासिन से तुमने गिरवर पूजवाया। स्वयं पूजे प्रभु आपही, दिखलायी माया ।। ॐ... <\br> <\br> गोप गऊ ब्रज बालक, सब के रूप धरे। ब्रह्मा मोहे पल में, तिन के कष्ट हरे।। ॐ...
मुरलीधर जब मुरली, अधरन अधर धरी । बृजवाला सब मोहे, इच्छा पूर्ण करि ।। ॐ... <\br> <\br> जो बृजपति की आरती, प्रेम सहित गावै। भक्ति पदार्थ काशी, मुक्ति फल पावे।। ॐ... <\br> <\br> ॐ जय गिरिराज हरी, स्वामी जय गिरिराज हरी । शरण तुम्हारी आये, करुणा पूर्ण करि ।। ॐ... <\br> <\br> पार ब्रह्मा परमात्मा, पूर्ण कृष्ण भगवान। तुम्ही एक निरगुण सगुण, कहते वेद पुराण | आरथा अरथी आरती, जिज्ञासु पार। <\br> <\br> भक्तों के हित के लिये लिया मनुज अवतार |
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