Vaibhav Lakshmi Vrat Katha and Udhyapan vidhi - वैभव लक्ष्मी व्रत कथा व उद्यापन विधि

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Vaibhav Lakshmi Vrat Katha and Udhyapan vidhi

वैभव लक्ष्मी व्रत कथा व उद्यापन विधि

|| या रक्ताम्बुजवासिनी विलासिनी चण्डांशु तेजस्विनी | या रक्ता रुधिराम्बरा हरिसखी या श्री मनोल्हादिनी || या रत्‍नाकरमन्थनात्प्रगटिता विष्णोस्वया गेहिनी || सा मां पातु मनोरमा भगवती लक्ष्मीश्‍च पद्‌मावती ||

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वैभव लक्ष्मी व्रत की कथा Vaibhav Lakshmi Vrat katha

एक गांव में बहुत से लोग रहते थे जो अपना काम मन लगा कर करते थे परन्तु आपस में किसी तरह की कोई मदद नहीं करते थे। पूजा पाठ, दया - भावना परोपकार जैसे संस्कार बहुत ज्यादा कम हो गए, वहां में बुराइयां बढ़ गई थीं। शराब, जुआ, रेस, व्यभिचार, चोरी-डकैती वगैरह बहुत से गुनाह शहर में होते थे। इनके बावजूद शहर में कुछ अच्छे लोग भी रहते थे।

ऐसे ही लोगों में शीला और उनके पति की गृहस्थी मानी जाती थी। शीला धार्मिक प्रकृति की और संतोषी स्वभाव वाली थी, उनका पति भी विवेकी और सुशील था। शीला और उसका पति कभी किसी की बुराई नहीं करते थे और प्रभु भजन में अच्छी तरह समय व्यतीत कर रहे थे, शहर के लोग उनकी गृहस्थी की सराहना करते थे।

देखते ही देखते समय बदल गया। शीला का पति बुरे लोगों से दोस्ती कर बैठा, अब वह जल्द से जल्द करोड़पति बनने के ख्वाब देखने लगा। इसलिए वह गलत रास्ते पर चल पड़ा फलस्वरूप वह रोडपति बन गया, यानी रास्ते पर भटकते भिखारी जैसी उसकी हालत हो गई थी। शराब, जुआ, रेस, चरस-गांजा वगैरह बुरी आदतों में शीला का पति भी फंस गया। दोस्तों के साथ उसे भी शराब की आदत हो गई, इस प्रकार उसने अपना सब कुछ रेस-जुए में गंवा दिया।

शीला को पति के बर्ताव से बहुत दुःख हुआ, किन्तु वह भगवान पर भरोसा कर सबकुछ सहने लगी। वह अपना अधिकांश समय प्रभु भक्ति में बिताने लगी, अचानक एक दिन दोपहर को उनके द्वार पर किसी ने दस्तक दी, शीला ने द्वार खोला तो देखा कि एक माँजी खड़ी थी। उसके चेहरे पर अलौकिक तेज निखर रहा था, उनकी आँखों में से मानो अमृत बह रहा था, उसका भव्य चेहरा करुणा और प्यार से छलक रहा था। उसको देखते ही शीला के मन में अपार शांति छा गई, शीला के रोम-रोम में आनंद छा गया। शीला उस माँजी को आदर के साथ घर में ले आई। घर में बिठाने के लिए कुछ भी नहीं था, अतः शीला ने सकुचाकर एक फटी हुई चद्दर पर उसको बिठाया।

माँ जी बोलीं- "क्यों शीला! मुझे पहचाना नहीं? हर शुक्रवार को लक्ष्मीजी के मंदिर में भजन-कीर्तन के समय मैं भी वहां आती हूं।" इसके बावजूद शीला कुछ समझ नहीं पा रही थी। फिर माँ जी बोलीं- 'तुम बहुत दिनों से मंदिर नहीं आईं अतः मैं तुम्हें देखने चली आई।'

माँ जी के अति प्रेमभरे शब्दों से शीला का हृदय पिघल गया, उसकी आंखों में आंसू आ गए और वह बिलख-बिलखकर रोने लगी। माँ जी ने कहा- 'बेटी! सुख और दुःख तो धूप और छाँव जैसे होते हैं, धैर्य रखो बेटी! मुझे तेरी सारी परेशानी बता।'

माँ जी के व्यवहार से शीला को काफी संबल मिला और सुख की आस में उसने माँ जी को अपनी सारी कहानी कह सुनाई।

कहानी सुनकर माँजी ने कहा- 'कर्म की गति न्यारी होती है। हर इंसान को अपने कर्म भुगतने ही पड़ते हैं, इसलिए तू चिंता मत कर, अब तू कर्म भुगत चुकी है। अब तुम्हारे सुख के दिन अवश्य आएँगे, तू तो माँ लक्ष्मीजी की भक्त है, माँ लक्ष्मीजी तो प्रेम और करुणा की अवतार हैं। वे अपने भक्तों पर हमेशा ममता रखती हैं। इसलिए तू धैर्य रखकर माँ लक्ष्मीजी का व्रत कर, इससे सब कुछ ठीक हो जाएगा।'

शीला के पूछने पर माँ जी ने उसे व्रत की सारी विधि भी बताई।

माँ जी ने कहा- 'बेटी! मां लक्ष्मीजी का व्रत बहुत सरल है, उसे 'वरद लक्ष्मी व्रत' या 'वैभव लक्ष्मी व्रत' कहा जाता है। यह व्रत करने वाले की सब मनोकामना पूर्ण होती है, वह सुख-संपत्ति और यश प्राप्त करता है।'

शीला यह सुनकर आनंदित हो गई। शीला ने संकल्प करके आँखें खोली तो सामने कोई न था, वह विस्मित हो गई कि माँ जी कहां गईं? शीला को तत्काल यह समझते देर न लगी कि माँ जी और कोई नहीं साक्षात्‌ लक्ष्मीजी ही थीं।

दूसरे दिन शुक्रवार था। सवेरे स्नान करके स्वच्छ कपड़े पहनकर शीला ने माँ जी द्वारा बताई विधि से पूरे मन से व्रत किया। आखिरी में प्रसाद वितरण हुआ, यह प्रसाद पहले पति को खिलाया। प्रसाद खाते ही पति के स्वभाव में फर्क पड़ गया, उस दिन उसने शीला को मारा नहीं, सताया भी नहीं। शीला को बहुत आनंद हुआ, उनके मन में 'वैभवलक्ष्मी व्रत' के लिए श्रद्धा बढ़ गई।

शीला ने पूर्ण श्रद्धा-भक्ति से इक्कीस शुक्रवार तक 'वैभवलक्ष्मी व्रत' किया। इक्कीसवें शुक्रवार को माँजी के कहे मुताबिक उद्यापन विधि कर के सात स्त्रियों को 'वैभवलक्ष्मी व्रत' की सात पुस्तकें उपहार में दीं। फिर माताजी के 'धनलक्ष्मी स्वरूप' की छबि को वंदन करके भाव से मन ही मन प्रार्थना करने लगीं- 'हे मां धनलक्ष्मी! मैंने आपका 'वैभवलक्ष्मी व्रत' करने की मन्नत मानी थी, वह व्रत आज पूर्ण किया है, हे मां! मेरी हर विपत्ति दूर करो। हमारा सबका कल्याण करो, जिसे संतान न हो, उसे संतान देना, सौभाग्यवती स्त्री का सौभाग्य अखंड रखना। कुंआरी लड़की को मनभावन पति देना, जो आपका यह चमत्कारी वैभवलक्ष्मी व्रत करे, उनकी सब विपत्ति दूर करना। सभी को सुखी करना, हे माँ! आपकी महिमा अपार है।' ऐसा बोलकर लक्ष्मीजी के 'धनलक्ष्मी स्वरूप' की छबि को प्रणाम किया।

व्रत के प्रभाव से शीला का पति अच्छा आदमी बन गया और कड़ी मेहनत करके व्यवसाय करने लगा। उसने तुरंत शीला के गिरवी रखे गहने छुड़ा लिए, घर में धन की बाढ़ सी आ गई। घर में पहले जैसी सुख-शांति छा गई, 'वैभवलक्ष्मी व्रत' का प्रभाव देखकर मोहल्ले की दूसरी स्त्रियां भी विधिपूर्वक 'वैभवलक्ष्मी व्रत' करने लगीं।

वैभव लक्ष्मी व्रत का उद्यापन कब करना चाहिए

सात, ग्यारह या इक्कीस, जितने भी शुक्रवारों की मन्नत माँगी हो, उतने शुक्रवार ‍तक यह व्रत पूरी श्रद्धा तथा भावना के साथ करना चाहिए। आखिरी शुक्रवार को इसका शास्त्रीय विधि के अनुसार उद्यापन करना चाहिए।

वैभव लक्ष्मी व्रत की उद्यापन विधि

आखिरी शुक्रवार को प्रसाद के लिए खी‍र बनानी चाहिए। जिस प्रकार हर शुक्रवार को हम पूजन करते हैं, वैसे ही करना चाहिए, पूजन के बाद माँ के सामने एक श्रीफल फोड़ें फिर कम से कम सात‍ कुंआरी कन्याओं या सौभाग्यशाली स्त्रियों को कुमकुम का तिलक लगाकर मां वैभवलक्ष्मी व्रत कथा की पुस्तक की एक-एक प्रति उपहार में देनी चाहिए और सबको खीर का प्रसाद देना चाहिए। इसके बाद माँ लक्ष्मीजी को श्रद्धा सहित प्रणाम करना चाहिए।

फिर माताजी के 'धनलक्ष्मी स्वरूप' की छबि को वंदन करके भाव से मन ही मन प्रार्थना करें- 'हे मां धनलक्ष्मी! मैंने आपका 'वैभवलक्ष्मी व्रत' करने की मन्नत मानी थी, वह व्रत आज पूर्ण किया है। हे माँ! हमारी (जो मनोकामना हो वह बोले) मनोकामना पूर्ण करें। हमारी हर विपत्ति दूर करो, हमारा सबका कल्याण करो, जिसे संतान न हो, उसे संतान देना, सौभाग्यवती स्त्री का सौभाग्य अखंड रखना, कुँआरी लड़की को मनभावन पति देना। जो आपका यह चमत्कारी वैभवलक्ष्मी व्रत करे, उनकी सब विपत्ति दूर करना, सभी को सुखी करना। हे माँ! आपकी महिमा अपार है,' आपकी जय हो! ऐसा बोलकर लक्ष्मीजी के 'धनलक्ष्मी स्वरूप' की छवि को प्रणाम करें।

Vaibhav Lakshmi Vrat Story in English

There were many people living in a village who used to do their work diligently but did not help each other in any way. Sanskars like worship, kindness and benevolence were greatly reduced, evils had increased there. Many crimes like alcohol, gambling, race, adultery, theft and dacoity were committed in the city. Despite this, some good people also lived in the city.

Sheela and her husband's household was considered among such people. Sheela was religious in nature and of contented nature, her husband was also prudent and well-mannered. Sheela and her husband never did evil to anyone and were spending time well in bhajan of the Lord, their household being appreciated by the people of the city.

Sightedly changed while watching. Sheela's husband became friends with bad people, now he started dreaming of becoming a millionaire as soon as possible. That's why he went on the wrong path, as a result he became a roadpati, that is, he had become like a beggar wandering on the way. Sheela's husband also got trapped in bad habits like alcohol, gambling, race, charas-ganja etc. He also got addicted to alcohol with friends, thus he lost everything in race-gambling.

Sheela was deeply saddened by her husband's behavior, but she started to bear everything by trusting God. She started spending most of her time in devotion to God, suddenly one afternoon someone knocked on her door, Sheela opened the door and saw that a mother was standing. Her face was brimming with supernatural brilliance, her eyes as if nectar was flowing, her majestic face overflowing with compassion and love. On seeing him, there was immense peace in Sheela's mind, there was joy in Sheela's romance. Sheela brought that mother into the house with respect. There was nothing to put in the house, so Sheela hesitantly made him sit on a torn sheet.

The mother said- "Why Sheela! Don't recognize me? Every Friday I also come there at the time of bhajan-kirtan in Lakshmiji's temple." Despite this, Sheela could not understand anything. Then mother said- 'You have not come to the temple for a long time, so I came to see you.'

Sheela's heart melted by the loving words of her mother, tears welled up in her eyes and she wept bitterly. Mother said- 'Daughter! Happiness and sorrow are like sunshine and shade, be patient, daughter! Tell me all your troubles.'

Sheela got a lot of support from mother's behavior and in the hope of happiness, she told her whole story to mother. Hearing the story, Mother said- 'The speed of action is different. Every person has to bear his karma, so don't worry, now you have suffered the karma. Now your happy days will surely come, you are a devotee of Mother Lakshmi, Mother Lakshmi is an incarnation of love and compassion. She always has affection for her devotees. That's why you keep the fast of Mother Lakshmi with patience, everything will be fine by this. On asking Sheela, Mother also told her the whole method of fasting. Mother said- 'Daughter! Mother Lakshmi's fast is very simple, it is called 'Varad Lakshmi Vrat' or 'Vaibhav Lakshmi Vrat'. All the wishes of the person who observes this fast are fulfilled, he gets happiness, wealth and fame.

Sheela was overjoyed to hear this. When Sheela opened her eyes with determination, there was no one in front of her, she was astonished that where did the mother go? It did not take long for Sheela to immediately understand that Mother ji was none other than Lakshmi ji. The second day was Friday. After taking a bath in the morning, wearing clean clothes, Sheela fasted with all her heart according to the method prescribed by her mother. Prasad was distributed in the last, this prasad was first fed to the husband. There was a difference in the nature of the husband as soon as he ate the prasad, that day he did not kill Sheela, did not even harass her. Sheela was very happy, her reverence for 'Vaibhavlakshmi Vrat' increased in her mind.

Sheela observed 'Vaibhavlakshmi Vrat' for twenty one Fridays with full devotion. On the twenty-first Friday, according to the mother's instructions, after performing the Udyapan method, seven women were gifted seven books of 'Vaibhavlakshmi Vrat'. Then after worshiping the image of Mother's 'Dhanalakshmi Swaroop', she started praying in her heart - 'O Mother Dhanalakshmi! I had taken your vow to observe 'Vaibhavlakshmi Vrat', that fast has been fulfilled today, O mother! Take away all my troubles. Do welfare of all of us, give children to those who do not have children, keep the good fortune of a fortunate woman unbroken. Giving a virtuous husband to a virgin, who observes this miraculous Vaibhavlakshmi fast of yours, removes all their troubles. Make everyone happy, O mother! Your glory is immense.' Saying this he bowed down to the image of 'Dhanalakshmi Swaroop' of Laxmiji.

Due to the effect of the fast, Sheela's husband became a good man and started doing business by working hard. He immediately freed Sheela's mortgaged ornaments, the house was flooded with money. There was peace and happiness in the house as before, seeing the effect of 'Vaibhavlakshmi Vrat', other women of the locality also started observing 'Vaibhavlakshmi Vrat' methodically.


Vaibhav Lakshmi Vrat Katha and Udhyapan vidhi Video

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