श्राद्ध कर्म

श्राद्ध कर्म

पितरों का आशीर्वाद पाने के लिए निमित्त तर्पण के साथ श्राद्ध कर्म किए जाते हैं।

हिंदू धर्म में पूर्णिमा श्राद्ध का बड़ा विशेष महत्व है, इस दिन से ही पितृ पक्ष का आरंभ हो जाता है। भाद्रपद पूर्णिमा को पूर्णिमा श्राद्ध के नाम से भी जाना जाता है। हम तिथि के अनुसार अपने पितरों का पिंडदान कर्म, तर्पण और श्राद्ध कर्म आदि करते हैं। पितृ पक्ष की अमावस्या को सवृ पितृ अमावस्या कहा जाता है, इस दिन उन सभी पितरों का पिंडदान और तर्पण किया जाता है, जिनकी तिथि ज्ञात नहीं होती या भूल चुके होते हैं।


पूर्णिमा श्राद्ध का महत्व कहते हैं कि इस दिन सत्यनारायण की पूजा करने से व्यक्ति को जीवन में धन आदि की कभी कमी नहीं होती. जो लोग घर में व्रत रखते हैं, उनके घर में सुख-समृद्धि का वास होता है, सारे कष्ट दूर होते हैं। इस दिन मान्यता है कि उमा-महेश्वर का व्रत किया जाता है, कहते हैं भगवान सत्यनारायण ने भी इस व्रत को किया था। इस दिन स्नान और दान आदि का भी विशेष महत्व है। भाद्रपद पूर्णिमा के दिन से पितृ पक्ष का आरंभ होता है, इस कारण इसका महत्व और अधिक बढ़ जाता है।


पूर्णिमा श्राद्ध विधि शास्त्रों के अनुसार पूर्णिमा श्राद्ध के दिन गए पितरों का श्राद्ध ऋषियों को समर्पित होता है। पूर्णिमा श्राद्ध के दिन गए पितरों को उसी दिन तर्पण दिया जाता है, उस दिन तस्वीर सामने रखें उन्हें चन्दन की माला पहना कर, सफेद चंदन का तिलक लगाएं। पूर्णिमा श्राद्ध के दिन पितरों को खीर अर्पित करें, खीर बनाते समय ध्यान रखें कि उसमें इलायची, केसर, शक्कर, शहद मिलाकर बनाएं। इसके बाद गाय के गोबर के उपले में अग्नि जला कर पितरों के निमित तीन पिंड बना कर आहुति दी जाती है, इसके बाद पंचबली भोग लगाया जाता है। गाय, कौआ, कुत्ता, चीटी और देवों के लिए प्रसाद निकालें और फिर ब्राह्मण को भोजन कराएं। इसके बाद स्वंय भोजन करें, ध्यान रखें कि श्राद्ध वाले दिन भोजन में प्याज और लहसुन का इस्तेमाल न करें.


पुरूष के श्राध्द में ब्राह्मण पुरुष को तथा औरत के श्राद्ध में ब्राह्मण महिला को भोजन कराते हैं, भोजन के पश्चात दक्षिणा दी जाती है। पितृपक्ष में पितरों की मरन- तिथि को ही उनका श्राध्द किया जाता है। गया में श्राध्द करने का बड़ा महत्त्व माना गया है। पितृपक्ष में देवताओं को जल देने के पश्चात् मृतकों का नामोच्चारण करके उन्हें भी जल देना चाहिए।