वैशाख मास की कथा (मई) - गणेश जी कथा

वैशाख मास की कथा (मई) - गणेश जी कथा

पुराने जमाने में रंतिदेव नामक एक राजा था । उसके राज्य में एक ब्राह्मण रहता था जिसका नाम था-धर्मकेतु। धर्मकेतु की दो पलियाँ थीं। एक का नाम था सुशीला और दूसरी का नाम चंचलता था। दोनों पत्नियों के विचारों एवं व्यवहार में बहुत अन्तर था। सुशीला धार्मिक वृत्ति की थी और व्रत-उपवास, पूजा अर्चना करती रहती थी। इसके विपरित चंचलता भोग-विलास में मस्त रहती थी। वह शरीर के श्रृंगार पर ही अधिक ध्यान देती रहती थी। किसी व्रत-उपवास या पूजा-अर्चना से उसका कुछ लेना-देना नहीं था। कुछ दिनों बाद धर्मकेतु की दोनों पत्नियों के सन्तान हुई। सुशीला के पुत्री हुई और चंचलता ने एक पुत्र को जन्म दिया। चंचलता सुशीला से कहती रहती थी- "सुशीला तूने इतने व्रत-उपवास करके अपने शरीर को सुखा लिया, फिर भी तेरे लड़की हुई। मैंने कोई व्रत-उपवास या पूजा-अर्चना नहीं की, फिर भी पुत्र को जन्म दिया।" कुछ दिन तक तो सुशीला सुनती रही। पर जब अति हो गई तो उसे बड़ा दुःख हुआ। उसने गणेश जी की आराधना की। गणेश जी प्रसन्न हुए तो उनकी कृपा से सुशीला की पुत्री के मुँह से बहुमूल्य मोती-मूंगे निकलने लगे। एक रूपवान पुत्र भी उसने जन्मा। सुशीला का ऐसा सौभाग्य जगा तो चंचलता के मन में जलन होने लगी। उसने सुशीला की बेटी को कुएँ में गिरा दिया। पर सुशीला पर तो गणेश जी की कृपा थी। उसकी बेटी का बाल भी बाँका नहीं हुआ और वह सकुशल कुएँ से निकाल ली गई।