करवा चौथ - विनायक जी की कथा - Karwachouth Vinayak ji ki katha

करवा चौथ - विनायक जी की कथा - Karwachouth Vinayak ji ki katha

विशेष : कहीं-कहीं पर करवा चौथ के दिन सूरज और चंद्रमा को अर्घ्य देते समय स्त्रियाँ हाथ में सोने की अंगूठी लेकर अर्घ्य देती हैं और यह दोहा कहती हैं- सोने की मुद्रा, मोतियन का हार। चंद्र-सूरज को अर्घ्य देती, जियो मेरे वीर भरतार।॥

एक गांव में दो माँ-बेटी थीं। बेटी माँ से बोली-'गांव से सब लोग गणेश मेला देखने जा रहे हैं। मैं भी मेले में जाऊँगी। माँ बोली- वहाँ पर बहुत भीड़ होगी। कहीं गिर पड़ गई तो चोट लगेगी ।' बेटी ने माँ की बात नहीं मानी तो माँ ने बेटी को दो लड्डू और घंटी में पानी देकर कहा- 'एक लड्डू तो गणेश जी को खिलाकर पानी मिला देना दूसरा लड्डू तुम खाकर बचा हुआ पानी पी लेना । ' बेटी मेले में चली गई।

मेला समाप्त होने पर सभी गांववासी वापिस आ गए परंतु उसकी बेटी नहीं आई। वह गणेश जी के पास बैठी रही। एक लड्डू पानी गणेश जी तुम्हें, एक लड्डू पानी मुझे, इस तरह कहते हुए पूरी रात बीत गई। गणेश जी ने सोचा कि यदि आज मैं लड्डू खाकर पानी नहीं पिऊँगा तो यह अपने घर नहीं जाएगी। इसलिए गणेश जी लड़के का रूप बनाकर आए। बेटी से 1 लड्डू लेकर खाया और पानी पिया और कहा- कुछ मांगो। लड़की ने मन में सोचा क्या माँगू? अन्न माँगू, धन माँगू, महल माँगू, सुहाग माँगू, खेत माँगू, बैल माँगू, बस इतना ही माँग लेती हैं।

गणेश जी उसके मन की बात जानकर बोले- अब अपने घर जाओ। जो तुमने मन में सोचा है वह सब तुझे मिलेगा। लड़की घर पहुंची तो माँ ने पूछा- 'इतनी देर कैसे हो गई ?' लड़की ने कहा आपके कहे अनुसार मैं गणेश जी को लड्डू खिलाकर, पानी पिलाकर आई हूँ। देखते ही देखते जो कुछ बेटी ने मन में सोचा था वह सब कुछ उनके घर में हो गया।

हे गणेश जी महाराज! जैसे आप उन माँ बेटी पर बरसे वैसे ही कहते-सुनते हर किसी पर बरसो।